दोस्त या रिश्तेदार को पैसे देते वक्त कागज़ माँगना अजीब लगता है। फिर महीने निकल जाते हैं, बात टलने लगती है, और लगता है कि अब कुछ नहीं हो सकता — क्योंकि लिखित में कुछ था ही नहीं।
यह गलत है। कागज़ न होना मामला कमज़ोर करता है, खत्म नहीं। और जो सबूत आपके पास पहले से है, वह आमतौर पर काफ़ी होता है।
जो आपके पास पहले से सबूत है
- बैंक transfer या UPI की entry — यह खुद में सबूत है कि पैसा गया। नकद दिया हो तो यही सबसे बड़ी कमी होती है।
- WhatsApp या SMS जिसमें वह पैसा मानता हो या लौटाने की बात करता हो।
- कोई चेक जो उसने दिया हो — चाहे वह बाउंस हुआ हो।
- वह आदमी जिसके सामने पैसा दिया गया था।
घड़ी जो चल रही है
उधार दिए पैसे के लिए अदालत जाने की सीमा तीन साल है — उस तारीख़ से जब पैसा लौटाना था। लेकिन अगर इन तीन साल के अंदर वह लिखित में मान ले कि पैसा देना है — और उस पर उसके दस्तख़त हों — तो तीन साल उसी दिन से दोबारा शुरू हो जाते हैं। इसीलिए टालमटोल के बीच एक लिखित स्वीकृति ले लेना सबसे कीमती कागज़ होता है।

क्रम से क्या करें
- पहले बात को लिखित में लाएँ — WhatsApp पर रकम और तारीख़ लिखकर पूछना कि कब तक लौटा रहे हैं। उसका जवाब ही सबूत बन जाता है।
- अगर उसने चेक दिया था और वह बाउंस हुआ, तो वह अलग और तेज़ रास्ता खोलता है।
- फिर वकील के ज़रिए लीगल नोटिस — बहुत बार यहीं बात बन जाती है।
- अगर लिखित वादा या चेक मौजूद है, तो वसूली का एक तेज़ अदालती रास्ता भी है, जिसमें सामने वाले को बिना ठोस वजह के मामला लटकाने नहीं दिया जाता।
एक बात साफ़ रखिए: यह जानकारी है, कानूनी सलाह नहीं। रकम बड़ी हो तो वकील से बात करना ही सही है — ख़ास तौर पर तब, जब तीन साल पूरे होने वाले हों।
अपनी पूरी आर्थिक स्थिति देखिएFrequently asked questions
- कोई कागज़ नहीं बना था, क्या अब कुछ हो सकता है?
- हाँ। बैंक या UPI की entry, मैसेज और गवाह — इन्हें सबूत माना जाता है। लिखित कागज़ न होना मामला कमज़ोर करता है, खत्म नहीं।
- नकद दिया था, तब?
- यही सबसे मुश्किल स्थिति है, क्योंकि रकम का रिकॉर्ड नहीं होता। अब सबसे ज़रूरी काम यही है कि उसकी तरफ़ से लिखित में स्वीकृति ली जाए।
- क्या बहुत पुराना मामला भी चलता है?
- समय-सीमा होती है, और वह उस दिन से गिनी जाती है जब पैसा लौटाना था। बीच में लिखित स्वीकृति मिल जाए तो गिनती नए सिरे से शुरू होती है।
- पुलिस में शिकायत करूँ?
- सादा उधार आमतौर पर दीवानी मामला है, आपराधिक नहीं — जब तक शुरू से धोखाधड़ी की नीयत न रही हो। इसलिए रास्ता आमतौर पर वसूली का होता है, FIR का नहीं।